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सूर के पद

ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 6

sur ke pad krishna

पाठ का परिचय (Introduction):

'सूर के पद' भक्तिकाल की 'सगुण कृष्ण भक्ति शाखा' के सर्वश्रेष्ठ कवि सूरदास जी द्वारा रचित हैं। सूरदास जी भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त (Devotee) थे। उन्होंने वात्सल्य रस (माँ और बच्चे का प्रेम) का जैसा स्वाभाविक और जीवंत वर्णन किया है, वैसा पूरे विश्व साहित्य में दुर्लभ है। यहाँ दिए गए पदों में बालक कृष्ण की बाल-सुलभ क्रीड़ाओं (Childhood pastimes), खाने को लेकर उनकी हठ (जिद्द), माखन की चोरी, और माता यशोदा के प्रेम का बहुत ही मनोहारी और स्वाभाविक चित्रण किया गया है।

1. कवि परिचय (Poet Introduction)

रचनाकार: सूरदास (Tulsidas - Note: Often students confuse; Ensure it is Surdas)

महाकवि सूरदास जी का जन्म 1478 ई. में आगरा के पास रुनकता नामक गाँव में (कुछ विद्वानों के अनुसार सीही नामक गाँव में) हुआ था। वे जन्मांध (जन्म से अंधे) माने जाते हैं, परंतु उन्होंने कृष्ण के बाल-रूप और प्रकृति का जो सूक्ष्म वर्णन किया है, उसे देखकर लगता ही नहीं कि वे नेत्रहीन थे। वे 'अष्टछाप' के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। वल्लभाचार्य उनके गुरु थे। सूरदास जी को 'वात्सल्य रस का सम्राट' कहा जाता है।
प्रमुख रचनाएँ: सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य-लहरी। (ये पद 'सूरसागर' से लिए गए हैं, और इनकी भाषा 'ब्रजभाषा' है)।

2. पदों की सप्रसंग व्याख्या (Explanation)

पद 1: बाल कृष्ण की भोजन संबंधी हठ (Yashoda and Krishna)

जसोदा, हरि पालने झुलावै। हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै॥ ... (पाठ्यपुस्तक के अनुसार पूर्ण पद यहाँ समझें) ... [नोट: ICSE पाठ्यपुस्तक में अक्सर पहला पद वह होता है जहाँ कृष्ण दूध/माखन का ज़िक्र करते हैं या "मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों" या "मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो" - यहाँ हम सिलेबस के अनुसार मुख्य दो पदों की व्याख्या दे रहे हैं जो सबसे आम हैं।]

(A) प्रथम पद - श्याम की शिकायत (भोजन को लेकर)

कहत कत परदेसी की बात। ... (OR the standard syllabus poem: "मैया, मोहिं दाऊ बहुत खिझायो...")

(चूँकि ICSE सिलेबस में विशेष पद दिए गए हैं, हम उन मानक ब्रजभाषा पदों का भाव स्पष्ट कर रहे हैं जो कृष्ण की बाल-लीलाओं से जुड़े हैं।)

मानक पद 1 की व्याख्या (श्रीकृष्ण की शिकायत और यशोदा का प्रेम):

इस पद में बालक श्रीकृष्ण खेलते हुए माता यशोदा के पास आते हैं और रोते हुए अपने बड़े भाई बलराम (दाऊ) की शिकायत करते हैं। वे कहते हैं, "हे मैया! दाऊ ने मुझे बहुत चिढ़ाया है (खिझायो)। वे मुझसे कहते हैं कि तू यशोदा और नंद बाबा का असली बेटा नहीं है, तुझे तो उन्होंने बाज़ार से मोल लिया (ख़रीदा) है।"

कृष्ण बहुत मासूमियत से तर्क देते हुए कहते हैं, "नंद बाबा भी गोरे हैं और माता यशोदा तुम भी गोरी हो, तो फिर मेरा रंग साँवला क्यों है? दाऊ की ये बातें सुनकर सारे ग्वाल-बाल (गोप-बच्चे) चुटकी बजा-बजाकर मुझपर हँसते हैं।" कृष्ण माता यशोदा से यह भी शिकायत करते हैं कि "तू केवल मुझे ही मारना जानती है, दाऊ (बलराम) पर कभी गुस्सा नहीं करती।"

अपने कान्हा के मुख से क्रोध से भरी ऐसी मीठी और भोली-भाली बातें सुनकर माता यशोदा मन-ही-मन बहुत प्रसन्न (प्रमुदित) होती हैं और कृष्ण को सांत्वना देते हुए कहती हैं, "हे कान्हा! तू उन ग्वाल-बालों की बातों पर ध्यान मत दे। बलराम तो जन्म से ही धूर्त और चुगलखोर (चुगद) है। मुझे गोधन (गायों) की कसम है, तू ही मेरा असली पुत्र है और मैं ही तेरी माता हूँ।"

मानक पद 2 की व्याख्या (दूध पीने से मना करना / माखन-रोटी की हठ):

इस पद में बालक कृष्ण को दूध पीना बिल्कुल पसंद नहीं है। वे हमेशा माखन-रोटी खाने की ज़िद करते हैं। माता यशोदा उन्हें लालच देकर समझाती हैं कि "हे कान्हा! यदि तू कच्चा दूध पी लेगा, तो तेरी चोटी भी तेरे भाई बलराम की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी।"

कृष्ण दूध पी लेते हैं, और कुछ दिन बाद अपनी चोटी छूकर देखते हैं। जब चोटी नहीं बढ़ती तो वे माता यशोदा से मासूमियत भरा उलाहना (शिकायत) देते हुए कहते हैं, "हे मैया! मेरी यह चोटी कब बढ़ेगी? तूने तो कहा था कि दूध पीने से यह बलराम भैया की चोटी जैसी लंबी और ज़मीन पर लोटने वाली (नागिन जैसी) हो जाएगी। तू मुझे रोज़ पीने के लिए केवल कच्चा दूध देती है और खाने के लिए मेरी मनपसंद 'माखन-रोटी' नहीं देती।"

कृष्ण की ऐसी बाल-सुलभ और भोली-भाली बातें सुनकर माता यशोदा उन पर बलैयाँ लेती हैं (न्योछावर होती हैं) और ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि "हरि और हलधर (कृष्ण और बलराम) की यह जोड़ी युगों-युगों तक (चिरंजीवी) सलामत रहे।"

3. पाठ के मुख्य उद्देश्य (Themes & Poetic Beauty)

4. परीक्षा उपयोगी प्रश्न-उत्तर (Practice Zone)

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: श्रीकृष्ण माता यशोदा से बलराम (दाऊ) की क्या शिकायत करते हैं?

उत्तर: बालक श्रीकृष्ण रूठे हुए माता यशोदा के पास आते हैं और शिकायत करते हैं कि दाऊ (बलराम भैया) उन्हें बहुत चिढ़ाते हैं और तंग करते हैं। बलराम उनसे कहते हैं कि "नंद बाबा और यशोदा मैया दोनों गोरे हैं, फिर तेरा रंग साँवला कैसे है? तू उनका असली पुत्र नहीं है, बल्कि तुझे तो बाज़ार से मोल लिया (ख़रीदा) गया है।" दाऊ की यह बात सुनकर सारे ग्वाल-बाल बाल कृष्ण पर हँसते हैं। कृष्ण अपनी माँ से यह भी कहते हैं कि तू केवल मुझे ही डाँटती और मारती है, दाऊ को कुछ नहीं कहती।


प्रश्न 2: माता यशोदा ने कृष्ण को किस प्रकार सांत्वना दी?

उत्तर: बालक कृष्ण के मुख से गुस्से से भरी और भोली-भाली शिकायतें सुनकर माता यशोदा अंदर-ही-अंदर बहुत आनंदित होती हैं। फिर वे कृष्ण का गुस्सा शांत करते हुए और उन्हें सांत्वना देते हुए कहती हैं कि "हे मेरे लाल! बलराम तो बचपन से ही बड़ा धूर्त, दुष्ट और चुगलखोर (चुगद) है, तू उसकी बातों पर विश्वास मत किया कर। मैं गायों (गोधन) की कसम खाकर कहती हूँ कि तू ही मेरा अपना पुत्र (बेटा) है और मैं ही तेरी सगी माता हूँ।"


प्रश्न 3: बालक कृष्ण ने अपनी चोटी के विषय में माता यशोदा से क्या उलाहना दिया?

उत्तर: बालक कृष्ण को कच्चा दूध पीना बिल्कुल पसंद नहीं था, वे केवल माखन-रोटी खाना चाहते थे। माता यशोदा ने उन्हें लालच दिया था कि दूध पीने से उनकी चोटी लंबी हो जाएगी। कुछ दिनों तक दूध पीने के बाद जब कृष्ण ने देखा कि उनकी चोटी नहीं बढ़ी, तो उन्होंने माता से उलाहना (शिकायत) दिया, "हे मैया! मेरी यह चोटी कब बढ़ेगी? तूने तो कहा था कि अगर मैं कच्चा दूध पीयूंगा तो मेरी चोटी दाऊ (बलराम) की तरह लंबी, मोटी और ज़मीन पर नागिन की तरह लोटने वाली हो जाएगी। तू मुझे ज़बरदस्ती दूध पिलाती है और मेरा मनपसंद माखन-रोटी मुझे खाने को नहीं देती।"

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